पटना : विकास कुमार ओझा, 21 अगस्त 2025 : बिहार की राजनीति इस समय जिस मोड़ पर खड़ी है, वहां जनता और सत्ता के बीच गहरी खाई बन चुकी है। यह खाई किसी विपक्ष या राजनीतिक साज़िश से नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के चारों ओर खड़े चंद अधिकारियों ने पैदा कर दी है। आरोप साफ़ है—नीतीश कुमार जनता से दूर हो गए हैं, और यह दूरी स्वेच्छा से नहीं, बल्कि उनके तथाकथित ‘विश्वसनीय’ अधिकारियों की साज़िश और नियंत्रण की देन है।
आज स्थिति यह है कि मुख्यमंत्री से मिलने के लिए जनता चाहे कितनी भी गुहार लगाए, अधिकारियों की दीवार इतनी ऊंची खड़ी कर दी गई है कि आम आदमी तो छोड़िए, पत्रकार और समाजसेवी तक मुख्यमंत्री तक अपनी आवाज़ नहीं पहुँचा पा रहे।
अधिकारियों का किला, जनता बाहर
मुख्यमंत्री कार्यालय के भीतर किसे एंट्री मिलेगी और किसे बाहर रोक दिया जाएगा, यह अब पूरी तरह से नौकरशाही तय करती है। सूत्र बताते हैं कि नए पीएस ने मुख्यमंत्री से जनता की मुलाकात और उनके प्रस्तावों को सीधा काट देना शुरू कर दिया है। यानी मुख्यमंत्री को यह खबर तक नहीं मिलती कि कोई नागरिक, कोई प्रतिनिधि, या कोई सामाजिक कार्यकर्ता उनसे मुलाकात कर अपनी समस्या और सुझाव रखना चाहता है।
यही वजह है कि आज जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर है। लोग खुलेआम कह रहे हैं कि मुख्यमंत्री अब ‘जनता के नहीं, अधिकारियों के’ हो चुके हैं। जिस नीतीश कुमार को जनता ने कभी ‘सुशासन बाबू’ का खिताब दिया था, वही नीतीश कुमार आज आम आदमी से मिलने से मानो वंचित कर दिए गए हैं।

पत्रकार का अनुभव – कैसे दबा दिया गया आग्रह पत्र
खुद बतौर पत्रकार मेरा अनुभव इसी साज़िश का सबूत है। सीमांचल की गंभीर समस्याओं और सुझावों को मुख्यमंत्री के सामने रखने के लिए मैंने औपचारिक आग्रह पत्र दिया। लेकिन यह आग्रह पत्र मुख्यमंत्री के सामने पहुँचा ही नहीं। कारण साफ़ है—नए पीएस ने इसे छांटकर फाइल से हटा दिया। मतलब यह कि मुख्यमंत्री तक यह सूचना पहुँची ही नहीं कि मैं उनसे मिलना चाहता हूँ और जनता की समस्याओं को साझा करना चाहता हूँ।
अब सवाल यह है कि जब एक पत्रकार की आवाज़ इस तरह दबा दी जा रही है तो आम जनता की फरियाद कहाँ सुनी जाएगी? मुख्यमंत्री को क्या यह भी पता है कि उनके ही घर के दरवाजे पर खड़े अधिकारी उनकी जनता को ही उनसे मिलने से रोक रहे हैं?
जनता में आक्रोश – ‘मुख्यमंत्री बंधक बन चुके हैं’
बिहार के कोने-कोने से मिल रही प्रतिक्रियाओं में जनता साफ़ कह रही है कि मुख्यमंत्री अब जनता के लिए नहीं, बल्कि अधिकारियों के लिए काम कर रहे हैं। हालात यहां तक पहुँच गए हैं कि लोग नीतीश कुमार को लेकर यह तक कहने लगे हैं—“मुख्यमंत्री अब जनता के नहीं रहे, वे अपने ही अधिकारियों के बंधक बन गए हैं।”
गांव से लेकर शहर तक यह चर्चा है कि आज जनता मुख्यमंत्री तक पहुँच ही नहीं सकती। जनता चाहे तो भी अधिकारी दीवार खड़ी कर देते हैं। सवाल यह है कि लोकतंत्र में चुने हुए मुख्यमंत्री अगर जनता की आवाज़ सुनने के लिए ही उपलब्ध नहीं होंगे, तो जनता अपने मुद्दे किसके सामने रखे?

नीतीश की छवि पर भारी नौकरशाही का शिकंजा
एक समय था जब नीतीश कुमार जनता दरबार लगाते थे और हर व्यक्ति को खुलकर अपनी समस्या कहने का मौका मिलता था। वही नीतीश कुमार अब जनता से मिलने की हिम्मत तक नहीं जुटा पा रहे। वजह केवल एक—अधिकारियों का शिकंजा। यह नौकरशाही मुख्यमंत्री की छवि को लगातार कमजोर कर रही है।
विपक्ष को बैठे-बैठाए मौका मिल गया है। वह जनता से कह रहे हैं कि नीतीश कुमार अब जनता के नेता नहीं, अधिकारियों के कठपुतली बन चुके हैं।
जनता की सीधी माँग – मुख्यमंत्री जवाब दें
आज बिहार की जनता पूछ रही है—
क्यों मुख्यमंत्री से मिलने का प्रस्ताव अधिकारियों की मेज़ पर ही दफन कर दिया जाता है?
क्यों मुख्यमंत्री को जनता के असली मुद्दों से दूर रखा जा रहा है?
क्या मुख्यमंत्री खुद जनता से मिलने से बच रहे हैं या फिर अधिकारी उन्हें बंधक बनाकर बैठे हैं?
यह सवाल केवल पत्रकार या विपक्ष का नहीं है। यह सवाल हर उस आम आदमी का है जिसने उम्मीद की थी कि नीतीश कुमार उनकी आवाज़ सुनेंगे, उनकी तकलीफ समझेंगे।
निष्कर्ष – जनता बनाम अफसरशाही
बिहार की तस्वीर बेहद खतरनाक है। मुख्यमंत्री और जनता के बीच खड़ी यह नौकरशाही लोकतंत्र की आत्मा के साथ खिलवाड़ कर रही है। मुख्यमंत्री को चाहिए कि वे इस लोहे की दीवार को तोड़ें और जनता के बीच आएं। अगर वे ऐसा नहीं करते, तो जनता का आक्रोश अब सिर्फ़ आरोपों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सड़कों पर भी फूटेगा।
नीतीश कुमार को यह समझना होगा कि मुख्यमंत्री की कुर्सी जनता की देन है, अधिकारियों की नहीं। और अगर वे जनता से दूरी बनाए रखेंगे, तो वही जनता एक दिन इस दूरी को स्थायी बना देगी।